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Green Hydrogen: भारत को मिलेगी स्वच्छ ऊर्जा की नई ताकत, 2030 तक 50 लाख टन उत्पादन का लक्ष्य

नई दिल्ली: भारत स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में अपनी निर्भरता और औद्योगिक जरूरतों को ध्यान में रखते हुए हरित हाइड्रोजन को भविष्य की अहम ऊर्जा तकनीक के रूप में विकसित कर रहा है। इसका इस्तेमाल उर्वरक उद्योग, पेट्रोलियम रिफाइनरी, इस्पात निर्माण, भारी वाहनों और जहाजों जैसे क्षेत्रों में कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए किया जा सकता है। केंद्र सरकार के राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन का लक्ष्य वर्ष 2030 तक देश में सालाना कम से कम 50 लाख मीट्रिक टन हरित हाइड्रोजन उत्पादन क्षमता विकसित करना है।

हरित हाइड्रोजन को भारत की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने, आयातित जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता घटाने और स्वच्छ औद्योगिक विकास को बढ़ावा देने के प्रयासों का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है। इस क्षेत्र में घरेलू विनिर्माण, अनुसंधान, कौशल विकास और निर्यात की संभावनाएं भी मौजूद हैं।

क्या है हरित हाइड्रोजन और यह क्यों है महत्वपूर्ण?

हरित हाइड्रोजन ऐसी हाइड्रोजन है, जिसका उत्पादन नवीकरणीय ऊर्जा से प्राप्त बिजली का उपयोग करके पानी के विद्युत अपघटन से किया जाता है। इस प्रक्रिया में पानी को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में विभाजित किया जाता है। यदि उत्पादन प्रक्रिया में उत्सर्जन निर्धारित मानकों के भीतर रहता है, तो इसे हरित हाइड्रोजन की श्रेणी में रखा जा सकता है।

हाइड्रोजन एक ऊर्जा वाहक है। इसे ऊर्जा के भंडारण और विभिन्न औद्योगिक प्रक्रियाओं में इस्तेमाल किया जा सकता है। ईंधन सेल में हाइड्रोजन ऑक्सीजन के साथ अभिक्रिया करके बिजली पैदा करती है, जिसमें मुख्य उप-उत्पाद पानी और गर्मी होते हैं। हालांकि, इसके उत्पादन, परिवहन और भंडारण के दौरान होने वाले उत्सर्जन और ऊर्जा खपत को भी ध्यान में रखना जरूरी है।

भारत में सौर और पवन ऊर्जा की उपलब्धता हरित हाइड्रोजन उत्पादन के विस्तार के अवसर प्रदान करती है। इसका उपयोग उन उद्योगों में विशेष रूप से उपयोगी हो सकता है, जहां सीधे बिजली के इस्तेमाल से उत्सर्जन कम करना मुश्किल है।

किन क्षेत्रों में होगा हरित हाइड्रोजन का इस्तेमाल?

1. उर्वरक उद्योग: अमोनिया के उत्पादन में हाइड्रोजन एक महत्वपूर्ण कच्चा माल है। वर्तमान में इसका बड़ा हिस्सा जीवाश्म ईंधन पर आधारित प्रक्रियाओं से प्राप्त होता है। हरित हाइड्रोजन के इस्तेमाल से कम उत्सर्जन वाला अमोनिया बनाया जा सकता है, जिसका उपयोग उर्वरक निर्माण में होगा।

2. पेट्रोलियम रिफाइनरी: रिफाइनरियों में हाइड्रोजन का उपयोग पेट्रोलियम उत्पादों से सल्फर हटाने और भारी तेल को उपयोगी ईंधनों में बदलने के लिए किया जाता है। जीवाश्म ईंधन से प्राप्त हाइड्रोजन की जगह हरित हाइड्रोजन का इस्तेमाल करने से रिफाइनरी क्षेत्र के उत्सर्जन में कमी आ सकती है।

3. इस्पात निर्माण: पारंपरिक इस्पात उत्पादन में कोयले का उपयोग कार्बन उत्सर्जन का प्रमुख कारण है। कुछ प्रत्यक्ष रूप से कम किए गए लौह उत्पादन प्रक्रियाओं में हरित हाइड्रोजन का उपयोग करके उत्सर्जन घटाया जा सकता है।

4. सड़क और रेल परिवहन: हाइड्रोजन ईंधन सेल से चलने वाली बसों, ट्रकों और ट्रेनों में बिजली उत्पन्न करके मोटर चलाई जाती है। लंबी दूरी और भारी भार वाले परिवहन में यह कुछ परिस्थितियों में उपयोगी विकल्प बन सकता है।

5. जहाजरानी: हरित हाइड्रोजन से हरित अमोनिया और हरित मेथनॉल जैसे ईंधन बनाए जा सकते हैं। इनका इस्तेमाल समुद्री परिवहन में किया जा सकता है, हालांकि इसके लिए उपयुक्त इंजन, सुरक्षा व्यवस्था और बंदरगाह सुविधाओं की आवश्यकता होगी।

6. ऊर्जा भंडारण और निर्यात: हरित हाइड्रोजन का इस्तेमाल नवीकरणीय ऊर्जा को अन्य रूप में संग्रहित करने और जरूरत के अनुसार उपयोग करने में किया जा सकता है। भारत हरित हाइड्रोजन के साथ-साथ हरित अमोनिया और हरित मेथनॉल जैसे उत्पादों के निर्यात की संभावनाओं पर भी काम कर रहा है।

राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन: 19,744 करोड़ रुपये का प्रावधान

केंद्र सरकार ने जनवरी 2023 में राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन को 19,744 करोड़ रुपये के बजट के साथ मंजूरी दी थी। नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय इस मिशन को लागू कर रहा है। इसका उद्देश्य भारत को हरित हाइड्रोजन और उससे बनने वाले उत्पादों के उत्पादन, उपयोग और निर्यात का प्रमुख केंद्र बनाना है।

मिशन के प्रमुख लक्ष्य हैं:

  • वर्ष 2030 तक सालाना कम से कम 50 लाख मीट्रिक टन हरित हाइड्रोजन उत्पादन क्षमता विकसित करना।
  • इलेक्ट्रोलाइजर के घरेलू निर्माण को बढ़ावा देना।
  • हरित हाइड्रोजन की उत्पादन लागत कम करना।
  • औद्योगिक क्षेत्रों में इसका इस्तेमाल बढ़ाना।
  • अनुसंधान, कौशल विकास और रोजगार के अवसरों को प्रोत्साहित करना।
  • हरित हाइड्रोजन और उसके उत्पादों के लिए निर्यात बाजार विकसित करना।

मिशन से जुड़े अनुमानों के अनुसार, इससे आठ लाख करोड़ रुपये से अधिक का निवेश आकर्षित करने और छह लाख से अधिक रोजगार अवसर पैदा करने की संभावना है। निर्धारित उत्पादन और उपयोग लक्ष्यों की प्राप्ति से सालाना लगभग पांच करोड़ मीट्रिक टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन कम करने में मदद मिलने का अनुमान है।

इलेक्ट्रोलाइजर निर्माण और उत्पादन को प्रोत्साहन

हरित हाइड्रोजन बनाने के लिए इलेक्ट्रोलाइजर सबसे महत्वपूर्ण उपकरणों में से एक है। यह नवीकरणीय बिजली की मदद से पानी को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में विभाजित करता है।

राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन के तहत एसआईजीएचटी यानी Strategic Interventions for Green Hydrogen Transition कार्यक्रम शुरू किया गया है। इसका उद्देश्य घरेलू इलेक्ट्रोलाइजर निर्माण और हरित हाइड्रोजन उत्पादन, दोनों को प्रोत्साहित करना है।

इस कार्यक्रम के लिए 2029-30 तक 17,490 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। इससे देश में उत्पादन क्षमता विकसित करने, आयात पर निर्भरता कम करने और तकनीकी क्षमताओं को मजबूत करने में मदद मिलने की उम्मीद है।

भारत में हरित हाइड्रोजन परियोजनाओं को मिल रहा बढ़ावा

हरित हाइड्रोजन को बड़े पैमाने पर अपनाने से पहले इस्पात, परिवहन और जहाजरानी जैसे क्षेत्रों में पायलट परियोजनाओं के माध्यम से तकनीक का परीक्षण किया जा रहा है। इन परियोजनाओं से उत्पादन लागत, सुरक्षा, भंडारण, परिवहन और औद्योगिक उपयोग से जुड़ी चुनौतियों को समझने में मदद मिलती है।

मिशन के तहत इस्पात क्षेत्र में पांच पायलट परियोजनाओं को मंजूरी दिए जाने की जानकारी दी गई है। परिवहन क्षेत्र में हाइड्रोजन से चलने वाली बसों और ट्रकों के परीक्षण तथा ईंधन भरने वाले केंद्रों के विकास पर भी काम किया जा रहा है।

इसके अतिरिक्त, कांडला, पारादीप और वी.ओ. चिदंबरनार बंदरगाहों को हरित हाइड्रोजन हब के रूप में विकसित करने की पहल की गई है। ऐसे हब में उत्पादन, भंडारण, परिवहन और औद्योगिक उपयोग से संबंधित सुविधाओं को एक स्थान पर विकसित करने का प्रयास किया जाता है।

भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन और परिवहन का भविष्य

हाइड्रोजन आधारित रेल परिवहन को स्वच्छ परिवहन के संभावित विकल्पों में शामिल किया जा रहा है। ऐसी ट्रेनें ईंधन सेल या अन्य हाइड्रोजन आधारित तकनीकों की मदद से बिजली उत्पन्न कर सकती हैं। इससे उन रेल मार्गों पर विकल्प मिल सकता है, जहां विद्युतीकरण करना कठिन या महंगा हो।

हालांकि, किसी ट्रेन के उद्घाटन, परिचालन शुरू होने, यात्रियों के लिए उपलब्धता और उसकी तकनीकी क्षमता से संबंधित दावों की पुष्टि आधिकारिक रेलवे जानकारी से की जानी चाहिए। हाइड्रोजन परिवहन का विस्तार ईंधन की लागत, उपलब्धता और सुरक्षा बुनियादी ढांचे पर भी निर्भर करेगा।

हरित हाइड्रोजन के लिए भारत ने तय किया उत्सर्जन मानक

भारत के नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय ने अगस्त 2023 में हरित हाइड्रोजन के लिए मानक अधिसूचित किया था। इसके अनुसार, उत्पादन स्रोत से संयंत्र के निकास बिंदु तक उत्सर्जन की गणना में प्रति किलोग्राम हाइड्रोजन के लिए कार्बन डाइऑक्साइड समतुल्य उत्सर्जन की सीमा दो किलोग्राम निर्धारित की गई है। यह आकलन 12 महीने के औसत के आधार पर किया जाता है।

इस मानक का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि हरित हाइड्रोजन के नाम पर उत्पादित ईंधन निर्धारित उत्सर्जन सीमा का पालन करे। प्रमाणन और सत्यापन की व्यवस्था से घरेलू बाजार के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय व्यापार में भी पारदर्शिता बढ़ाने में मदद मिल सकती है।

अनुसंधान, कौशल विकास और रोजगार पर जोर

हरित हाइड्रोजन उद्योग को आगे बढ़ाने के लिए तकनीकी विशेषज्ञों, प्रशिक्षित कर्मचारियों और अनुसंधान की जरूरत होगी। इस क्षेत्र में इलेक्ट्रोलाइजर निर्माण, नवीकरणीय ऊर्जा, गैस भंडारण, पाइपलाइन, ईंधन सेल, सुरक्षा और औद्योगिक इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों में रोजगार की संभावनाएं बन सकती हैं।

सरकार अनुसंधान एवं विकास परियोजनाओं, स्टार्टअप और कौशल प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से इस क्षेत्र की क्षमताओं को बढ़ाने का प्रयास कर रही है। भारत में विकसित तकनीकें भविष्य में घरेलू मांग पूरी करने के साथ-साथ निर्यात के अवसर भी पैदा कर सकती हैं।

ESTIC-2026 में भी स्वच्छ ऊर्जा तकनीकों पर जोर

27 से 29 अक्टूबर 2026 तक नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं नवाचार सम्मेलन ESTIC-2026 में ऊर्जा तकनीकों सहित विभिन्न उभरते क्षेत्रों पर चर्चा की जा रही है। वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) द्वारा आयोजित इस सम्मेलन का उद्देश्य विज्ञान, अनुसंधान, उद्योग और तकनीकी नवाचार के बीच सहयोग को बढ़ावा देना है।

हरित हाइड्रोजन जैसी तकनीकें भारत के ऊर्जा परिवर्तन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। ऐसी तकनीकों का विस्तार अनुसंधान, निवेश, उद्योग और सरकारी नीतियों के बीच समन्वय पर निर्भर करेगा।

क्या हैं हरित हाइड्रोजन के सामने चुनौतियां?

हरित हाइड्रोजन के विस्तार की संभावनाओं के साथ कुछ महत्वपूर्ण चुनौतियां भी हैं। इनमें उत्पादन लागत, पर्याप्त नवीकरणीय बिजली की उपलब्धता, पानी की जरूरत, गैस के भंडारण और परिवहन की जटिलता तथा सुरक्षा मानकों का पालन शामिल है।

इसके अलावा, हाइड्रोजन का उपयोग हर क्षेत्र में सबसे किफायती विकल्प नहीं है। जहां सीधे बिजली का इस्तेमाल संभव है, वहां बैटरी या विद्युतीकरण अधिक प्रभावी हो सकता है। इसलिए हरित हाइड्रोजन का इस्तेमाल उन क्षेत्रों में प्राथमिकता से बढ़ाना महत्वपूर्ण है, जहां उत्सर्जन घटाने के अन्य विकल्प सीमित हैं।

2030 तक भारत की स्वच्छ ऊर्जा रणनीति में अहम भूमिका

राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसके जरिए सरकार घरेलू उत्पादन, औद्योगिक उपयोग, तकनीकी नवाचार और निर्यात को बढ़ावा देने की दिशा में काम कर रही है।

यदि उत्पादन लागत कम करने, पर्याप्त नवीकरणीय ऊर्जा उपलब्ध कराने, आवश्यक बुनियादी ढांचा विकसित करने और विश्वसनीय प्रमाणन सुनिश्चित करने में सफलता मिलती है, तो हरित हाइड्रोजन भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने में योगदान दे सकती है। यह 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य और 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन हासिल करने की प्रतिबद्धता के अनुरूप स्वच्छ औद्योगिक विकास का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन सकती है।

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