रक्षाबंधन:- भाई-बहन के प्रेम, विश्वास और स्नेह का प्रतीक माना जाता है। हर साल सावन पूर्णिमा के दिन मनाए जाने वाले इस त्योहार पर बहनें भाइयों की कलाई पर राखी बांधती हैं और उनकी लंबी उम्र व सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। वहीं भाई भी बहनों की रक्षा और हर परिस्थिति में साथ देने का संकल्प लेते हैं।
रक्षाबंधन की शुरुआत कब और कैसे हुई, इसे लेकर इतिहास और धार्मिक परंपराओं में अलग-अलग कथाएं मिलती हैं। इनमें तीन प्रमुख कथाएं सबसे ज्यादा प्रचलित हैं।
1. भगवान कृष्ण और द्रौपदी की कथा
महाभारत से जुड़ी एक प्रसिद्ध मान्यता के अनुसार, एक बार भगवान कृष्ण की उंगली में चोट लगने से खून निकलने लगा। यह देखकर द्रौपदी ने अपनी साड़ी का एक टुकड़ा फाड़कर उनकी उंगली पर बांध दिया। मान्यता है कि इसके बाद कृष्ण ने द्रौपदी की रक्षा का वचन दिया और चीरहरण के समय उनकी लाज बचाई।
2. इंद्र और इंद्राणी की कथा
एक अन्य पौराणिक कथा देवासुर संग्राम से जुड़ी है। मान्यता है कि जब देवताओं और असुरों के बीच युद्ध हुआ, तब इंद्र की पत्नी इंद्राणी ने मंत्रों से अभिमंत्रित रक्षा सूत्र इंद्र की कलाई पर बांधा। इसके बाद इंद्र को युद्ध में विजय मिली। इसी कथा को भी रक्षा सूत्र की परंपरा से जोड़ा जाता है।
3. रानी कर्णावती और हुमायूं की कथा
रक्षाबंधन से जुड़ी एक ऐतिहासिक रूप से चर्चित कथा रानी कर्णावती और मुगल सम्राट हुमायूं की है। कहा जाता है कि संकट के समय रानी कर्णावती ने हुमायूं को राखी भेजकर मदद की अपील की थी। हुमायूं ने इसे भाई का रिश्ता मानते हुए उनकी सहायता के लिए आगे बढ़ने का फैसला किया। हालांकि इस घटना को लेकर इतिहासकारों के बीच मतभेद भी हैं।
आज भी कायम है राखी का भाव
रक्षाबंधन की इन कथाओं में भले ही अलग-अलग पात्र और समय दिखाई देते हैं, लेकिन इनके केंद्र में रक्षा, विश्वास और रिश्तों की मजबूती का भाव समान है। यही वजह है कि सदियों से राखी का त्योहार भारतीय संस्कृति में विशेष महत्व रखता है।


