रांची:– झारखंड खेल प्रतिभाओं के मामले में देश के प्रमुख राज्यों में गिना जाता है। हॉकी, तीरंदाजी, फुटबॉल, एथलेटिक्स और अन्य खेलों में राज्य के खिलाड़ियों ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई है। इसके बावजूद खिलाड़ियों के सामने करियर और रोजगार की चुनौती बनी हुई है।
राज्य गठन के शुरुआती 23 वर्षों में सीधे नियुक्ति के माध्यम से महज 44 खिलाड़ियों को ही सरकारी नौकरी मिल सकी। खिलाड़ियों का कहना है कि मेडल जीतने और राज्य का नाम रोशन करने के बावजूद उन्हें स्थायी रोजगार के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता है।
2007 में बनी थी पहली खेल नीति
झारखंड में पहली खेल नीति वर्ष 2007 में तैयार की गई थी। इसमें खिलाड़ियों के लिए सरकारी नौकरी में 2 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया था, लेकिन नियमावली और प्रक्रिया के स्तर पर इसे प्रभावी तरीके से लागू नहीं किया जा सका। बाद में कई खिलाड़ियों ने नौकरी के लिए आवेदन भी किया, लेकिन बड़ी संख्या में मामले लंबित रहे।
2021 में राज्य सरकार की ओर से 39 खिलाड़ियों को सीधी नियुक्ति दी गयी थी। वहीं कई अन्य खिलाड़ी दस्तावेज सत्यापन और नियुक्ति प्रक्रिया पूरी होने का इंतजार करते रहे।
नई खेल नीति में रोजगार का प्रावधान
झारखंड में नई खेल नीति को खिलाड़ियों के भविष्य को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। सरकार की ओर से खेल नीति में खिलाड़ियों के लिए नौकरी और शिक्षण संस्थानों में आरक्षण की व्यवस्था की बात कही गयी है। सरकार ने खिलाड़ियों को आर्थिक सहायता और उनके भविष्य को सुरक्षित करने की दिशा में भी कदम उठाने की बात कही है।
इसके बावजूद खिलाड़ियों के बीच यह सवाल बना हुआ है कि मेडल और उपलब्धियों के बाद उन्हें स्थायी रोजगार कब मिलेगा?
कई प्रतिभाशाली खिलाड़ी बेहतर रोजगार और भविष्य की तलाश में दूसरे राज्यों या केंद्रीय संस्थानों का रुख कर चुके हैं। वहीं रेलवे जैसे संस्थान झारखंड के खिलाड़ियों को रोजगार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
झारखंड के खिलाड़ियों की मांग है कि खेल नीति को सिर्फ पुरस्कार और सम्मान तक सीमित न रखा जाए, बल्कि शानदार प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ियों के लिए रोजगार की स्पष्ट और समयबद्ध व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।


