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75 वर्षों से मां दुर्गा की आराधना का केंद्र है करगली बाजार का नवाखली मंदिर, बंगाली परंपरा की दिखती है अनूठी छटा

बेरमो: झारखंड के बोकारो जिले के बेरमो स्थित करगली बाजार का नवाखली दुर्गा मंदिर पिछले 75 वर्षों से मां दुर्गा की आराधना और बंगाली संस्कृति की परंपरा को संजोए हुए है। यहां घट स्थापना से शुरू हुई पूजा की परंपरा आज भी श्रद्धा और भक्ति के साथ जारी है। बंगाली रीति-रिवाजों से होने वाली पूजा, विजयादशमी पर सिंदूर खेला और महिलाओं की पारंपरिक उलू ध्वनि मंदिर को विशिष्ट पहचान देती है। मां दुर्गा के दर्शन के लिए स्थानीय श्रद्धालुओं के साथ झारखंड के बाहर से भी भक्त पहुंचते हैं।

घट स्थापना से शुरू हुआ था आस्था का सफर

नवाखली दुर्गा मंदिर की पहचान केवल एक धार्मिक स्थल के रूप में नहीं, बल्कि वर्षों से चली आ रही सांस्कृतिक विरासत के रूप में भी है। बताया जाता है कि करीब 75 वर्ष पहले यहां घट स्थापित कर मां दुर्गा की पूजा-अर्चना शुरू की गई थी। समय के साथ यह परंपरा विकसित हुई और बाद में मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित कर पूजा करने की शुरुआत हुई।

तब से लेकर आज तक मंदिर में पूजा-अर्चना का सिलसिला जारी है। इस दौरान कई पीढ़ियां बदल गईं, लेकिन मां दुर्गा के प्रति श्रद्धालुओं की आस्था बनी रही। बुजुर्गों से लेकर नई पीढ़ी तक, लोगों का इस मंदिर से भावनात्मक जुड़ाव है। श्रद्धालु यहां परिवार की सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना लेकर पहुंचते हैं।

बंगाली रीति-रिवाजों से होती है मां दुर्गा की पूजा

नवाखली दुर्गा मंदिर में दुर्गोत्सव के दौरान बंगाली परंपरा की विशेष झलक देखने को मिलती है। धार्मिक अनुष्ठानों और पारंपरिक विधि-विधानों के बीच मां दुर्गा की आराधना की जाती है। पूजा के दौरान मंदिर परिसर भक्तिमय वातावरण से सराबोर रहता है।

यहां दुर्गोत्सव धार्मिक आस्था के साथ-साथ सामाजिक एकजुटता का भी प्रतीक है। पूजा के आयोजन में लोगों की भागीदारी और पारिवारिक जुड़ाव इस परंपरा को जीवंत बनाए रखते हैं। मंदिर से जुड़ी परंपराएं स्थानीय लोगों की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी हैं।

सिंदूर खेला में दिखता है श्रद्धा और भावनाओं का संगम

नवाखली दुर्गा मंदिर में विजयादशमी के अवसर पर होने वाला सिंदूर खेला बंगाली दुर्गोत्सव की प्रमुख परंपराओं में शामिल है। इस दौरान सुहागिन महिलाएं मां दुर्गा को सिंदूर अर्पित करती हैं और एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर सुख, सौभाग्य और परिवार की खुशहाली की कामना करती हैं।

मां की विदाई के समय मंदिर परिसर में श्रद्धा और भावुकता का अनूठा माहौल देखने को मिलता है। महिलाएं मां दुर्गा को अगले वर्ष फिर आने की प्रार्थना के साथ विदाई देती हैं। सिंदूर खेला की यह परंपरा धार्मिक विश्वास के साथ महिलाओं के आपसी स्नेह और सांस्कृतिक जुड़ाव को भी दर्शाती है।

उलू ध्वनि से गूंज उठता है मंदिर परिसर

बंगाली दुर्गोत्सव की एक खास पहचान महिलाओं की पारंपरिक उलू ध्वनि भी है। जीभ को कंपन देकर निकाली जाने वाली यह मंगल ध्वनि शुभता, उल्लास और उत्सव का प्रतीक मानी जाती है।

नवाखली दुर्गा मंदिर में उलू ध्वनि की गूंज और सिंदूर खेला की परंपरा दुर्गोत्सव के माहौल को खास बनाती है। इन परंपराओं के माध्यम से बंगाली संस्कृति और धार्मिक विरासत की झलक देखने को मिलती है।

झारखंड के बाहर से भी दर्शन करने पहुंचते हैं श्रद्धालु

नवाखली दुर्गा मंदिर की ख्याति करगली बाजार और आसपास के क्षेत्रों तक सीमित नहीं है। मां दुर्गा के दर्शन और पूजा-अर्चना में शामिल होने के लिए दूर-दराज के क्षेत्रों से भी श्रद्धालु पहुंचते हैं। झारखंड के बाहर से आने वाले भक्तों की मौजूदगी मंदिर के प्रति लोगों की आस्था को दर्शाती है।

दुर्गोत्सव के दौरान मंदिर परिसर में भक्तिमय माहौल रहता है। पूजा, पारंपरिक अनुष्ठान और सांस्कृतिक गतिविधियां श्रद्धालुओं को एक साथ जोड़ती हैं।

75 वर्षों की परंपरा, आने वाली पीढ़ियों के लिए विरासत

नवाखली दुर्गा मंदिर की 75 वर्षों की यात्रा आस्था, संस्कृति और परंपरा के निरंतर प्रवाह की कहानी है। घट स्थापना से शुरू हुई पूजा, मां दुर्गा की प्रतिमा की आराधना, सिंदूर खेला और उलू ध्वनि जैसी परंपराओं ने इस मंदिर को विशिष्ट पहचान दी है।

आज यह मंदिर केवल पूजा-अर्चना का स्थान नहीं, बल्कि स्थानीय लोगों की भावनाओं और सांस्कृतिक विरासत का केंद्र भी है। पीढ़ियों से चली आ रही श्रद्धा और हर वर्ष मां दुर्गा के आगमन की प्रतीक्षा इस परंपरा को जीवंत बनाए हुए है। यही वजह है कि करगली बाजार का नवाखली दुर्गा मंदिर आज भी श्रद्धालुओं के लिए आस्था का महत्वपूर्ण केंद्र बना हुआ है।

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