Thursday, January 15, 2026
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झारखंड के चतुर्दिक विकास के लिए और कितना समय चाहिए ?

(15 नवंबर,झारखंड प्रांत स्थापना के 25 वें वर्ष पर विशेष )

25 वर्ष पूर्व आज के ही दिन सन् 2000 में झारखंड प्रांत अस्तित्व में आया था । उम्मीद थी कि धीरे-धीरे कर झारखंड की तस्वीर बदल जाएगी। झारखंड प्रांत अपने स्थापना के पच्चीसवें वर्ष में पहुंच जाने के बावजूद इसकी की तस्वीर में जो बदलाव देखा जाना चाहिए, नहीं दिख पा रहा है। जबकि इसी कालखंड में छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड भी एक – एक नए प्रांत के रूप में अस्तित्व में आया था। झारखंड की तुलना में छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड में इससे कहीं ज्यादा विकास देखा जा सकता है। अब सवाल यह उठता है कि झारखंड का विकास इतनी धीमी गति से क्यों है ? जबकि झारखंड प्रांत पूरी तरह युवा हो चुका है। इस प्रांत में खनिज संपदा की कोई कमी नहीं है । मेरी दृष्टि में इसका सबसे बड़ा कारण है, राजनीतिक इच्छा शक्ति की कमी। झारखंड अलग प्रांत निर्माण के बाद कभी भी एक दलीय सरकार के हाथों में सत्ता का नेतृत्व नहीं रहा। इस प्रांत में हमेशा गठबंधन की ही सरकार रही, जिसका झारखंड के विकास पर बहुत ही प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। इस विषय पर झारखंड के सत्ता पक्ष और विपक्ष के नेताओं सहित राज्यवासियों को समग्रता से विचार करने की जरूरत है।
झारखंड अलग प्रांत स्थापना के साथ ही राजनीतिक अस्थिरता का दौर ऐसा रहा था कि इस अस्थिरता में झारखंड का लगभग 14 बरस बर्बाद होकर रह गया था । इस दरमियान कई सरकारें आईं । लेकिन सभी सरकारें समय से पहले ही काल कवलित हो गईं । इस राजनीतिक अस्थिरता के बाद झारखंड में भाजपा गठबंधन की सरकार रघुवर दास के नेतृत्व में बनी । झारखंड में पहली बार कोई एक सरकार पांच साल पूरा की थी। हेमंत सोरेन की गठबंधन की सरकार अपने दूसरे टर्म पर बहुत तेजी के साथ आगे जरूर बढ़ रही है, लेकिन विकास की जो रफ्तार पकड़नी चाहिए पकड़ नहीं पा रही है। वहीं दूसरी ओर इस प्रांत में कोई बड़ा उद्योग लग नहीं पा रहा है। जिस कारण लोगों का पलायन रुक नहीं पा रहा है । आज भी लाखों की संख्या में लोग रोजी – रोजगार के लिए अन्य प्रदेशों में कार्यरत हैं।
झारखंड में अभी तक जिस गठबंधन की भी सरकार अस्तित्व में आई, हर विधानसभा चुनाव के दौरान सभी ने यह घोषणा की कि जब उनकी सरकार बनेगी तो राज्य में बेरोजगारी दूर होगी । शिक्षा के स्तर पर भी सुधार होगा। लेकिन बीते चौबीस वर्षों के इनके कार्यकाल पर गौर किया जाए तो यह भी बात अब बेमानी लगने लगी है। बीते दो वर्षों के दौरान हेमंत सोरेन सरकार ने कुछ महत्वपूर्ण बिलों को जरूर पारित कर दिया है । प्रांत के कुछ विभागों में कुछ सरकारी नियुक्तियां जरूर हुई हैं। वहीं दूसरी और झारखंड में पढ़े-लिखे बेरोजगार लोगों की एक लंबी फेहरिस्त है। इन सरकारी नियुक्तियों पर सिर्फ इतना कहा जा सकता है कि यह ऊंट के मुंह में जीरा का फौरन के समान है । झारखंड की आबादी जिस रफ्तार से बढ़ी है। उसी रफ्तार से यहां बेरोजगारी भी बड़ी है । झारखंड सरकार को इस बात पर जरूर ध्यान देना चाहिए।‌ इस संबंध यह लिखना ज़रूरी हो जाता है कि नियुक्तियों के नाम पर इतना ढिंढोरा पीटने की कोई जरूरत नहीं है। इस नाम के ढिंढोरा पर झारखंड सरकार का करोड़ों रुपए खर्च हो जाते हैं। झारखंड में अब तक बाबूलाल मरांडी, अर्जुन मुंडा, शिबू सोरेन, मधु कोड़ा, हेमंत सोरेन के नेतृत्व में सरकारें जरूर बनी । लेकिन एक भी सरकार के कार्यकाल को स्वर्णिम कार्यकाल नहीं कहा जा सकता है। सभी सरकारों ने जनता के बीच जाकर घोषणाओं का अंबार जरूर लगा दिया, लेकिन जब उनकी सरकार गठित हुई, तब सारी घोषणाएं धरी की धरी रह गई ।
यह सत्य है कि झारखंड खनिज संपदाओं से भरा एक उत्कृष्ट राज्य है । लेकिन झारखंड के खनिज संपदाओं का जिस हिसाब से दोहन हुआ, उसका लाभ झारखंड प्रांत को नहीं मिल पाया। झारखंड में कोयला प्रचुर मात्रा में है। झारखंड में अभ्रक प्रचुर मात्रा में है । झारखंड में बॉक्साइट प्रचुर मात्रा में है । यहां तक कि झारखंड में सोना के भी खदान मिले हैं । इन तमाम खनिज संपदाओं के रहते हुए भी हमारा झारखंड गरीब है । उम्मीद थी कि झारखंड में उपलब्ध खनिज संपदाओं पर आधारित उद्योग लगेंगे । लेकिन झारखंड राज्य अस्तित्व में आने के बाद इस दिशा में बिल्कुल ही कार्य नहीं हुआ । झारखंड अलग प्रांत निर्माण के बाद जितनी भी सरकारें आईं। किसी सरकार ने भी उपलब्ध खनिज संपदाओं पर‌ आधारित एक भी उद्योगों की शुरुआत नहीं की। यह बेहद ही चिंता की बात है।
झारखंड से कोयला देश के विभिन्न प्रदेशों में जाते हैं। उन प्रदेशों में कोयला आधारित उद्योगों के माध्यम से वहां के उद्यमी और सरकार भी लाभान्वित हो रही है। लेकिन हमारा राज्य इस लाभ से पूरी तरह वंचित है । इस दिशा में झारखंड की सरकार की अनदेखी कई प्रश्नों को खड़ा करती है । एक जमाना था कि यहां के अभ्रक खनन से राज्य को काफी लाभ प्राप्त हो रहा था। यह सर्वविदित है कि अभ्रक का मल्टी परपस इस्तेमाल होता है। इसकी मांग संपूर्ण विश्व में है । लेकिन इस दिशा में झारखंड सरकार की उपेक्षा वाली नीति के कारण अभ्रक खनन की दिशा में कोई भी प्रगति नहीं हो पाया । फलस्वरुप अभ्रक का उत्पादन झारखंड में कमतर होता चला गया। जिस खनन से झारखंड को लाभ मिलना चाहिए, बिल्कुल लाभ नहीं मिल पा रहा है । राज्य सरकार की उपेक्षा पूर्ण नीति के कारण अभ्रक खनन पूरी तरह प्रभावित हो गया है।
झारखंड में जड़ी बूटियों की खेती से काफी कुछ राजस्व की प्राप्त हो सकता है। झारखंड में दुर्लभ किस्म के जड़ी बूटी उपलब्ध है। यह जड़ी बूटी झारखंड के विभिन्न जिलों और पहाड़ों पर पैदा होते हैं । इस दिशा में सरकार पूरी तरह कान में तेल देखकर चुप बैठी है । अगर झारखंड के जड़ी बूटी उत्पादन की दिशा में कार्य होता तो झारखंड के लाखों बेरोजगारों को रोजगार मिल पाता । इससे झारखंड को काफी राजस्व की भी प्राप्ति होती। झारखंड में आम, अमरूद, पपीता, केला की पैदावार की भी काफी संभावना है । बहुत सारे किसान आम, केला, पपीता, अमरूद, जामुन आदि फल पैदा कर लाभान्वित हो रहे हैं। लेकिन सरकार के असहयोग के कारण इस दिशा में जो कार्य होना चाहिए, नहीं हो पा रहा है। यह निर्विवाद सत्य है कि यहां के फल अन्य प्रांतों के फलों की तुलना में ज्यादा गुणकारी और लाभकारी है । यहां के फलों की मांग देश के विभिन्न राज्यों में है । लेकिन इस दिशा में राज्य के किसानों को प्रशिक्षित तक नहीं किया गया है। फलस्वरूप झारखंड फल के मामले में बहुत पीछे चला गया है।
झारखंड के जंगली फल केंद, प्यार आदि ऐसे फल है, जो कई गुणों से युक्त है । साथ ही यह जंगली फल औषधि के रूप में भी काम आते हैं । लेकिन इस दिशा में भी जो कार्य होना चाहिए नहीं हो पाया। फलस्वरुप इस क्षेत्र से भी लाभ की जगह हानि ही मिल रही है ।
उम्मीद थी कि झारखंड अलग प्रांत बनने के बाद शिक्षा के क्षेत्र में काफी विस्तार होगा लेकिन। यह बात भी गलत साबित हुई। सरकारी स्कूलों के हालात दिन-ब-दिन सुधरने की जगह बिगड़ते चले जा रहे हैं। जबकि दिल्ली जैसे राज्य के सरकारी स्कूल, निजी स्कूलों की तुलना में काफी आगे निकल गए हैं। आज झारखंड में सरकारी स्कूलों की गिरती शिक्षा व्यवस्था के कारण यहां के अभिभावक अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ाना उचित नहीं समझते हैं। फलस्वरूप झारखंड में शिक्षा का स्तर बहुत ही नीचे चला गया है । वहीं निजी स्कूलों का बोल बाला बढ़ता चला जा रहा है।
स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों के हालात में कोई बेहतर सुधार दिख नहीं रहा है। बल्कि सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में व्याप्त अनियमितता की बराबर खबरें अखबारों में छपती रहती हैं । वहीं निजी अस्पतालों की के धांधली की भी खबरें आती हैं । सरकारी अस्पतालों की उदासीनता और निजी अस्पतालों की धांधली के कारण झारखंड की जनता पीसी जा रही है । इसलिए झारखंड स्थापना दिवस पर झारखंड के सभी राज्य वासियों को यह विचार करने की जरूरत है कि झारखंड का सम्यक और चतुर्दिक विकास कैसे हो ? इस विषय पर राज्य सरकार सहित विपक्षी दल को भी आत्म निरीक्षण करने की जरूरत है। तभी झारखंड की तस्वीर बदल सकती है ।

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