शक्ति खूंटा में पारंपरिक सरना रीति-रिवाज से पूजा-अर्चना के साथ दो दिवसीय ऐतिहासिक जतरा शुरू, पांच लाख से अधिक लोगों के पहुंचने की संभावना
मांडर, रांची: पारंपरिक रीति-रिवाज, मांदर-नगाड़ों की गूंज और आदिवासी संस्कृति की जीवंत झलक के बीच ऐतिहासिक मुड़मा जतरा का शुभारंभ मंगलवार को हुआ। मांडर स्थित शक्ति खूंटा स्थल पर पारंपरिक सरना विधि-विधान से पूजा-अर्चना के साथ दो दिवसीय जतरा की शुरुआत की गई। पहले दिन से ही मेले में उत्साह और रौनक देखने को मिली। यह जतरा आदिवासी समाज की धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक एकजुटता का महत्वपूर्ण प्रतीक माना जाता है।
मंगलवार शाम करीब चार बजे सरना धर्मगुरु बंधन तिग्गा की अगुवाई में 40 पड़हा के महतो, पाहन, पुजार, पनभरा, कोटवार सहित अन्य पारंपरिक धार्मिक अगुवा बाजे-गाजे के साथ शक्ति खूंटा पहुंचे। यहां विधिवत पूजा-अर्चना की गई। इसके बाद मुख्य मंच पर स्थापित कलश के समक्ष दीप प्रज्वलित कर जतरा के शुभारंभ की घोषणा की गई। इस अवसर पर सरना धर्मगुरु बंधन तिग्गा ने मुड़मा जतरा के ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए लोगों से अपनी परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने की अपील की। कार्यक्रम का संचालन रवि तिग्गा ने किया।
आदिवासी समाज की पारंपरिक व्यवस्था का प्रतीक है शक्ति खूंटा
मुड़मा स्थित शक्ति खूंटा आदिवासी समाज के लिए विशेष धार्मिक और सामाजिक महत्व रखता है। प्रचलित ऐतिहासिक मान्यता के अनुसार, जब आदिवासी समुदाय रोहतासगढ़ से छोटानागपुर की ओर आए थे, तब मुड़मा में उरांव और मुंडा समुदाय के बीच समझौता हुआ था। इसी मान्यता के कारण शक्ति खूंटा को सामाजिक एकता और पारंपरिक व्यवस्था का पवित्र प्रतीक माना जाता है।
आदिवासी समाज की परंपरा में पड़हा व्यवस्था की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। मान्यता के अनुसार, जब सात पड़हा और 21 पड़हा के स्तर पर किसी विवाद का समाधान नहीं हो पाता, तब 40 पड़हा के लोगों का सामूहिक जुटान होता है। विचार-विमर्श के बाद विवादों के समाधान के लिए निर्णय लिया जाता है। इस लिहाज से मुड़मा जतरा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामूहिक निर्णय, सामाजिक समरसता और पारंपरिक न्याय व्यवस्था की विरासत को भी दर्शाता है।
आधुनिकता के दौर में भी बरकरार है सदियों पुरानी परंपरा
मुड़मा जतरा का आयोजन कई सौ वर्षों से होता आ रहा है। समय के साथ मेले का स्वरूप बदला है, लेकिन इसकी मूल सांस्कृतिक पहचान आज भी कायम है। पहले ढिबरी की रोशनी में दुकानें सजती थीं और लोग पारंपरिक तरीके से मेले का आनंद लेते थे। आज आधुनिक सुविधाओं और बढ़ती व्यावसायिक गतिविधियों के बीच भी मांदर-नगाड़ों की थाप, पारंपरिक पूजा और सामुदायिक भागीदारी इस आयोजन की पहचान बनी हुई है।
हर साल बड़ी संख्या में लोग यहां पहुंचते हैं। जतरा के माध्यम से नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों, पारंपरिक मान्यताओं और सामाजिक व्यवस्था से जुड़ने का अवसर मिलता है।
दो दिनों में 20 से 25 करोड़ रुपये के कारोबार का अनुमान
मुड़मा जतरा धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन के साथ-साथ बड़े व्यापारिक मेले के रूप में भी पहचान रखता है। आयोजकों के अनुसार, यहां हर साल करीब तीन हजार छोटी-बड़ी दुकानें लगती हैं। इस वर्ष दो दिनों में पांच लाख से अधिक लोगों के पहुंचने की संभावना जताई गई है।
आयोजकों का अनुमान है कि मेले के दौरान करीब 20 से 25 करोड़ रुपये का कारोबार हो सकता है। विभिन्न प्रकार की दुकानों के साथ मेले में घरेलू सामान, पारंपरिक वस्तुओं और अन्य जरूरत के उत्पादों की खरीदारी के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। हालांकि, कारोबार और आगंतुकों की संख्या से संबंधित ये आंकड़े आयोजकों के अनुमान हैं।
आज 40 पड़हा के जुटान से बढ़ेगी जतरा की रौनक
बुधवार को जतरा के दूसरे दिन विभिन्न पड़हा के लोग पारंपरिक प्रतीक चिह्नों और वाद्य यंत्रों के साथ आयोजन स्थल पर जुटेंगे। 40 पड़हा के लोगों की भागीदारी इस आयोजन की धार्मिक और सांस्कृतिक महत्ता को विशेष रूप से प्रदर्शित करेगी। पारंपरिक वेशभूषा, रीति-रिवाज और सामूहिक सहभागिता के बीच आदिवासी संस्कृति की विविध झलक देखने को मिलेगी।
सुरक्षा और यातायात के इंतजाम
जतरा में बड़ी संख्या में लोगों के पहुंचने की संभावना को देखते हुए प्रशासन की ओर से सुरक्षा और यातायात व्यवस्था के इंतजाम किए गए हैं। उद्देश्य है कि श्रद्धालुओं, ग्रामीणों और मेले में आने वाले अन्य लोगों को आवागमन में परेशानी न हो।
ऐतिहासिक मुड़मा जतरा एक बार फिर आदिवासी समाज की आस्था, परंपरा, सांस्कृतिक पहचान और एकजुटता का संदेश दे रहा है। आधुनिकता के दौर में भी इस आयोजन की निरंतरता झारखंड की समृद्ध आदिवासी विरासत को जीवंत बनाए हुए है।

