रांची/हजारीबाग: झारखंड के हजारीबाग पश्चिमी वन प्रमंडल से जुड़े अधिकारियों के खिलाफ लगाए गए गंभीर आरोपों का मामला एक बार फिर चर्चा में है। शिकायत पर राज्यपाल सचिवालय और भारत सरकार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के स्तर से पत्राचार के बाद वन विभाग ने जांच रिपोर्ट उपलब्ध कराने के लिए प्रधान मुख्य वन संरक्षक (PCCF), झारखंड को रिमाइंडर भेजा है। वन विभाग के विशेष सचिव राजदीप संजय लाल जॉन ने पत्र जारी कर मामले में जल्द जांच कराकर प्रतिवेदन उपलब्ध कराने का अनुरोध किया है।
यह मामला तत्कालीन क्षेत्रीय मुख्य वन संरक्षक (RCCF) रवींद्र नाथ मिश्रा, वन संरक्षक ममता प्रियदर्शी और हजारीबाग पश्चिमी वन प्रमंडल के डीएफओ मौन प्रकाश के खिलाफ की गई शिकायत से जुड़ा है। सेवानिवृत्त सहायक वन संरक्षक अविनाश कुमार परमार ने इन अधिकारियों पर गंभीर आरोप लगाते हुए उच्चस्तरीय जांच और आवश्यक कार्रवाई की मांग की है। हालांकि, शिकायत में लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित अधिकारियों का पक्ष सामने आना अभी बाकी है।
विशेष सचिव ने PCCF को भेजा रिमाइंडर
वन विभाग के विशेष सचिव राजदीप संजय लाल जॉन की ओर से जारी पत्र में अधिकारियों के खिलाफ प्राप्त परिवाद की जांच का उल्लेख किया गया है। पत्र के अनुसार, इस मामले में पहले मुख्य वन संरक्षक (निगरानी), झारखंड से जांच कराकर मंतव्य सहित रिपोर्ट मांगी गई थी, लेकिन विभाग को अनुपालन प्रतिवेदन प्राप्त नहीं हुआ था।
इसी के बाद विशेष सचिव ने दोबारा पत्र लिखकर मुख्य वन संरक्षक (निगरानी) से जल्द जांच कराने और रिपोर्ट विभाग को उपलब्ध कराने का अनुरोध किया है। पत्र की एक प्रति शिकायतकर्ता अविनाश कुमार परमार को भी भेजे जाने की बात कही गई है।
पत्र में राज्यपाल सचिवालय और भारत सरकार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से संबंधित पूर्व पत्राचार का भी संदर्भ दिया गया है। इससे मामले में जांच प्रतिवेदन उपलब्ध कराने की प्रक्रिया को लेकर विभागीय स्तर पर फिर से कार्रवाई शुरू होने का संकेत मिलता है।
तीन वरिष्ठ वन अधिकारियों के खिलाफ शिकायत
शिकायतकर्ता अविनाश कुमार परमार ने तत्कालीन RCCF रवींद्र नाथ मिश्रा, वन संरक्षक ममता प्रियदर्शी और डीएफओ मौन प्रकाश के खिलाफ गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव, राज्यपाल और भारत सरकार को पत्र लिखकर मामले की उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग की थी।
परमार के आरोपों के अनुसार, हजारीबाग पश्चिमी वन प्रमंडल से संबंधित एक मामले की जांच के लिए गठित दो सदस्यीय समिति ने अंतरिम रिपोर्ट सौंपी थी। उनका दावा है कि रिपोर्ट सौंपे जाने के बावजूद उस पर लंबे समय तक आवश्यक कार्रवाई नहीं की गई।
शिकायतकर्ता ने यह भी आरोप लगाया है कि जांच रिपोर्ट को लगभग पांच महीने तक लंबित रखा गया। हालांकि, इस संबंध में संबंधित अधिकारियों का आधिकारिक पक्ष उपलब्ध नहीं है और आरोपों की पुष्टि जांच के निष्कर्षों से ही हो सकेगी।
23 जुलाई 2025 के पत्र को लेकर भी विवाद
मामले में 23 जुलाई 2025 को तत्कालीन क्षेत्रीय मुख्य वन संरक्षक रवींद्र नाथ मिश्रा की ओर से जारी एक पत्र का भी उल्लेख किया गया है। शिकायतकर्ता के अनुसार, इस पत्र में जांच रिपोर्ट पर कथित नाराजगी का जिक्र करते हुए जांच करने वाले दोनों सहायक वन संरक्षकों से स्पष्टीकरण मांगे जाने और कार्रवाई के निर्देश की बात कही गई थी।
अविनाश कुमार परमार का आरोप है कि जांच रिपोर्ट में उठाए गए बिंदुओं पर कार्रवाई करने के बजाय जांच करने वाले अधिकारियों को ही निशाने पर लिया गया। उनका दावा है कि जांच प्रक्रिया के दौरान निष्पक्षता के सिद्धांतों का पालन नहीं किया गया।
शिकायतकर्ता ने संबंधित पत्राचार का हवाला देते हुए यह सवाल भी उठाया है कि जांच रिपोर्ट पर आपत्ति किस स्तर से जताई गई थी और जांच अधिकारियों से स्पष्टीकरण मांगने का निर्णय किस आधार पर लिया गया। इन सवालों पर विभागीय जांच और संबंधित दस्तावेजों के परीक्षण के बाद ही स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
जिस डीएफओ के खिलाफ शिकायत, उसी से रिपोर्ट की समीक्षा कराने का आरोप
अविनाश कुमार परमार ने अपनी शिकायत में एक अन्य गंभीर सवाल उठाया है। उनका आरोप है कि जिस डीएफओ मौन प्रकाश के खिलाफ शिकायत की जांच के लिए समिति गठित की गई थी, उसी अधिकारी से संबंधित जांच रिपोर्ट की समीक्षा कराई गई।
परमार का दावा है कि इस प्रक्रिया में जांच अधिकारियों को ही दोषी ठहराने की कोशिश की गई। उन्होंने इसे जांच की निष्पक्षता से जुड़ा मुद्दा बताते हुए उच्चस्तरीय जांच की मांग की है।
हालांकि, इस आरोप की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। मामले में संबंधित अधिकारियों का पक्ष और विभागीय रिकॉर्ड सामने आने के बाद ही पूरे घटनाक्रम की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
हाईकोर्ट से राहत मिलने का भी उल्लेख
शिकायतकर्ता अविनाश कुमार परमार को इस प्रकरण से जुड़े मामले में हाईकोर्ट से राहत मिलने की बात भी सामने आई है। हालांकि, उपलब्ध विवरण में संबंधित न्यायिक आदेश, मुकदमे का पूरा विवरण और राहत की प्रकृति स्पष्ट नहीं है। इसलिए इस संबंध में विस्तृत निष्कर्ष निकालने के लिए न्यायालय के आदेश का अवलोकन आवश्यक होगा।
अब जांच रिपोर्ट पर टिकी निगाहें
हजारीबाग पश्चिमी वन प्रमंडल से जुड़े इस मामले में अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि विभागीय जांच कब पूरी होती है और जांच प्रतिवेदन में क्या तथ्य सामने आते हैं। विशेष सचिव की ओर से PCCF को भेजे गए रिमाइंडर के बाद रिपोर्ट उपलब्ध कराने की प्रक्रिया पर निगाहें टिकी हैं।
फिलहाल अधिकारियों के खिलाफ लगाए गए आरोप शिकायतकर्ता के दावों पर आधारित हैं। जांच रिपोर्ट, विभागीय कार्रवाई और संबंधित अधिकारियों का पक्ष सामने आने के बाद ही पूरे मामले की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

