देवघर स्थित बाबा द्यनाथ मंदिर देश के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल है। इसे पवित्र द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यहां माता सती का हृदय गिरने के कारण यह स्थल शक्तिपीठ के रूप में भी प्रसिद्ध है। इस वजह से बाबा बैद्यनाथ धाम में शिव और शक्ति की संयुक्त उपासना का विशेष महत्व माना जाता है।
नवरात्र के अवसर पर यहां आने वाले श्रद्धालु बाबा बैद्यनाथ का जलाभिषेक कर भगवान शिव की आराधना करते हैं। मान्यता है कि इस पवित्र धाम में पूजा-अर्चना करने से शिव और शक्ति दोनों की उपासना का पुण्य प्राप्त होता है।
सप्तमी से नवमी तक तीन मंदिरों के पट रहते हैं बंद
नवरात्र के दौरान जहां देशभर के मंदिरों और पूजा पंडालों में मां दुर्गा की प्रतिमाओं के दर्शन के लिए पट खोल दिए जाते हैं, वहीं बाबा बैद्यनाथ मंदिर परिसर में स्थित तीन शक्तिस्वरूपा देवियों के मंदिरों में अलग परंपरा निभाई जाती है।
मंदिर परिसर में स्थित त्रिपुर सुंदरी, माता संध्या और मां काली के मंदिरों के पट सप्तमी से नवमी तिथि तक बंद रहते हैं। इस अवधि में श्रद्धालुओं को इन मंदिरों के भीतर स्थापित देवी विग्रहों का स्पर्श करने और सामान्य रूप से पूजा करने की अनुमति नहीं होती।
बाबा बैद्यनाथ धाम के सरदार पंडा पंडित गुलाबानन्द ओझा के अनुसार, इस दौरान तीनों मंदिरों के पुजारी जनकल्याण की कामना से तांत्रिक विधि-विधान के अनुसार पूजा-अर्चना करते हैं।
दर्पण में दर्शन कर पूजा करते हैं पुरोहित
इस परंपरा की खास बात यह है कि मंदिरों के पट बंद रहने के बावजूद देवी-देवताओं की दैनिक पूजा की परंपरा जारी रहती है। सरदार पंडा पंडित गुलाबानन्द ओझा ने बताया कि पुरोहित दर्पण के माध्यम से माता के विग्रह को देखकर दूर से पूजा-अर्चना करते हैं।
नवमी तिथि के बाद तीनों मंदिरों के पट श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए जाते हैं। इसके बाद भक्त फिर से माता के दर्शन और पूजा-अर्चना कर सकते हैं।
देशभर में विशेष धार्मिक पहचान रखता है बाबा बैद्यनाथ धाम
बाबा बैद्यनाथ धाम की पहचान केवल ज्योतिर्लिंग के कारण ही नहीं, बल्कि इससे जुड़ी शक्तिपीठ की मान्यता और विशिष्ट पूजा परंपराओं के कारण भी है। नवरात्र के दौरान यहां निभाई जाने वाली यह परंपरा श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रहती है।

