बेरमो: करगली के बिनोद बिहारी महतो फुटबॉल ग्राउंड में आयोजित करम महोत्सव की शाम झारखंडी संस्कृति और परंपरा के रंग में रंगी नजर आई। मांदर की गूंज, करम गीतों की मधुर धुन और पारंपरिक नृत्य ने पूरे माहौल को जीवंत कर दिया। ऐसा लगा मानो झारखंड की लोकसंस्कृति अपनी माटी की कहानी खुद बयां कर रही हो।
पारंपरिक साड़ियों में सजी महिलाओं ने जब एक साथ कदम से कदम मिलाकर करम गीतों पर नृत्य किया, तो पूरा परिसर झारखंडी संस्कृति की खूबसूरत तस्वीर में बदल गया। महिलाओं के चेहरे पर उत्साह, आंखों में अपनापन और कदमों में परंपरा की लय ने कार्यक्रम को खास बना दिया।
मांदर की हर थाप के साथ लोकजीवन और पुरखों की विरासत की झलक देखने को मिली। करम गीतों में प्रकृति के प्रति आस्था, नृत्य में सामाजिक एकता और करम डाल के प्रति श्रद्धा का भाव साफ नजर आया। लोगों ने पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ करम पर्व की सांस्कृतिक महत्ता को भी महसूस किया।
करम महोत्सव महज मनोरंजन का कार्यक्रम नहीं, बल्कि माटी, संस्कृति और विरासत से जुड़ने का अवसर भी बना। आधुनिकता के दौर में आयोजित इस कार्यक्रम ने यह संदेश दिया कि समय बदलने के बावजूद अपनी जड़ों और परंपराओं से जुड़ाव समाज की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत बनाए रखता है।
करगली की धरती पर सजी करम की यह महफिल लोक संस्कृति, सामाजिक एकजुटता और प्रकृति के प्रति सम्मान का संदेश छोड़ गई। कार्यक्रम में पारंपरिक गीत-संगीत और नृत्य के माध्यम से नई पीढ़ी को भी अपनी सांस्कृतिक विरासत से जुड़ने का अवसर मिला।


