सम्राट चौधरी सरकार के सामने अब बड़ी चुनौती है. सरकार को भरत तिवारी मामले की पूरी सच्चाई बतानी होगी. न्यायिक जांच की अंतरिम रिपोर्ट में क्या सामने आया, यह भी जनता को बताया जाना चाहिए. परिवार को नौकरी और मुआवजा देने की वजह भी साफ करनी होगी. अगर पुलिस की गलती सामने आती है, तो दोषियों पर कार्रवाई होनी चाहिए. एनकाउंटर अपराध रोकने का तरीका हो सकता है, लेकिन न्याय का रास्ता नहीं.
सरकार को देना होगा जवाब
पटना: बिहार में भरत तिवारी एनकाउंटर का मामला अब सिर्फ एक पुलिस कार्रवाई का मामला नहीं रह गया है. यह सरकार की पुलिस नीति पर भी सवाल खड़े कर रहा है. मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने भरत तिवारी के परिवार को आर्थिक मदद और एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने का ऐलान किया है. सरकार का कहना है कि ये फैसला न्यायिक जांच आयोग की अंतरिम रिपोर्ट के आधार पर लिया गया है. सरकार का ये फैसला मानवीय नजरिए से सही लग सकता है. किसी परिवार ने अपना सदस्य खोया है. उसे आर्थिक मदद मिलनी चाहिए. परिवार को सहारा भी चाहिए. लेकिन सवाल यहीं खत्म नहीं होता. असली सवाल तो अब शुरू होता है.
अगर भरत तिवारी की मौत एक सामान्य और सही पुलिस मुठभेड़ में हुई थी, तो फिर उनके परिवार को सरकारी नौकरी क्यों दी जा रही है? पुलिस ने शुरुआत में उन्हें अपराधी बताया था. ऐसे में सरकार की ओर से मुआवजा और नौकरी की घोषणा कई सवाल पैदा करती है. क्या उन लोगों को भी सरकारी नौकरी और मुवाजा दिया जाएगा जिनका हाल के दिनों में एनकाउंटर हुआ है.
विपक्ष उठा रहे सवाल
विपक्ष इसी सवाल को उठा रहा है. आरजेडी और कांग्रेस का कहना है कि सरकार को साफ करना चाहिए कि आखिर जांच में क्या सामने आया. अगर पुलिस की कार्रवाई गलत थी, तो सरकार को सिर्फ नौकरी और पैसे का ऐलान नहीं करना चाहिए. उसे यह भी बताना चाहिए कि गलती किसकी थी. गोली चलाने का आदेश किसने दिया? पुलिसकर्मियों की भूमिका क्या थी? उनके खिलाफ क्या कार्रवाई होगी?


