Thursday, January 15, 2026
Homenationalलोहड़ी पर्व उत्तर भारत को जोड़ने वाली सांस्कृतिक धरोहर

लोहड़ी पर्व उत्तर भारत को जोड़ने वाली सांस्कृतिक धरोहर

सती के योगाग्नि-दहन की याद में अग्नि जलाकर लोहड़ी पर्व मनाया जाता है। 13 जनवरी, उत्तर भारत का प्रसिद्ध पर्व 'लोहड़ी' पर विशेष।

मकर संक्रांति से एक दिन पूर्व संपूर्ण उत्तर भारत में मनाया जाने वाला लोहड़ी पर्व की बात ही निराली है। यह पर्व विभिन्न रस्मों से बंधा एक संकल्प और उल्लास का पर्व है। लोहड़ी पर्व संपूर्ण उत्तर भारत को एक सूत्र में बांधने की सीख देता चला आ है।‌ यह पर्व सीधे तौर पर प्रकृति की उपासना का पर्व है।‌

अग्नि जो ऊर्जा का आधार है। उसकी उपासना का तात्पर्य यह है कि अग्नि का कभी भी अनादर नहीं करना चाहिए।‌ यह संपूर्ण जगत ऊर्जा से ही संचालित है। ऊर्जा का मानवीय जीवन में बहुत ही महत्व है। जगत के सभी जीव – जंतु, पेड़ – पौधे अक्षय ऊर्जा की शक्ति से ही संचालित है। यहां अक्षय ऊर्जा का तात्पर्य है, प्राण शक्ति से ।‌ अर्थात आत्मा से। जब तक जीव – जंतु और पेड़ पौधों में यह प्राण रूपी अदृश्य ऊर्जा समाहित है, तभी तक ये जीवित हैं। यह पर्व हम सबों को ऊर्जावान बनने की भी सीख देता है । हिंदू धर्म ग्रंथो के अनुसार दक्ष प्रजापति की पुत्री सती के योगाग्नि-दहन की याद में अग्नि जलाकर लोहड़ी पर्व मनाया जाता है। यह पर्व हम सबों को जात-पात और बड़े छोटे के फर्क को भुलाकर एक साथ अग्नि प्रज्वलित कर उसकी ऊष्मा आंतरिक और बाहरी तौर पर पवित्र होने की भी सीख प्रदान करता है।

विश्व भर के भारतीय इस पर्व को मनाते हैं

यह लोहड़ी का पर्व अब सिर्फ उत्तर भारत तक ही सीमित नहीं है बल्कि उत्तर भारत से निकलकर देश के विभिन्न राज्यों में बड़े ही उल्लास के साथ मनाया जाता है । चूंकि उत्तर भारत के लोग व्यवसाय, नौकरी एवं अन्य कार्यों से देश के विभिन्न प्रांतों में आ बसे थे। यह सिलसिला आज भी जारी है। ये सभी अपने साथ उत्तर भारत के कई पर्वों को भी ले आएं। ‌लोहड़ी पर्व पर ये तो खुद शामिल होते ही हैं, वहीं अपने अगल-बगल के लोगों को भी शामिल करते हैं। यह कारवां यहीं नहीं रुका है बल्कि यह पर्व भारत से निकलकर जहां भी उत्तर भारत के लोग विदेशों में बसें, ये प्रवासी भारतीय वहां भी बड़े ही उल्लास के साथ संध्या में एक जगह इकट्ठे होकर अग्नि प्रज्वलित कर बड़े ही धूमधाम के साथ लोहड़ी पर्व मनाते हैं।

लोहड़ी एक विशेष मौसमी पर्व के रूप में मनाई जाती है

ऐसे लोहड़ी उत्तर भारत का एक प्रसिद्ध त्योहार है। यह मकर संक्रान्ति के एक दिन पहले मनाया जाता है। मकर संक्रान्ति की पूर्वसंध्या पर इस त्यौहार का उल्लास रहता है। आम तौर पर इस पर्व की रात्रि में किसी खुले स्थान में परिवार एवं आस-पड़ोस के लोग मिलकर आग के किनारे घेरा बनाकर बैठते हैं तथा इस समय रेवड़ी, मूंगफली, लावा आदि खाकर पर्व मनाते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार लोहड़ी पौष के अंतिम दिन, सूर्यास्त के बाद, माघ संक्रांति से पहली रात में यह पर्व मनाया जाता है। यह मुख्यतः पंजाब का पर्व है। यह द्योतार्थक शब्द लोहड़ी की पूजा के समय व्यवहृत होने वाली वस्तुओं के द्योतक वर्णों का समुच्चय जान पड़ता है, जिसमें लकड़ी, गोहा, सूखे उपले, रेवड़ी अर्थात ‘लोहड़ी’ के प्रतीक हैं। श्वतुर्यज्ञ का अनुष्ठान मकर संक्रांति पर होता था, संभवतः लोहड़ी उसी का अवशेष है। पूस-माघ की कड़कड़ाती सर्दी से बचने के लिए आग भी सहायक सिद्ध होती है। यही व्यावहारिक आवश्यकता लोहड़ी को मौसमी पर्व का स्थान देती है।

परंपराओं एवं रीति-रिवाजों का प्रमाण है लोहड़ी पर्व

लोहड़ी से संबद्ध परंपराओं एवं रीति-रिवाजों से ज्ञात होता है कि प्रागैतिहासिक गाथाएं भी इस पर्व से जुड़ी हुई हैं। दक्ष प्रजापति की पुत्री सती के योगाग्नि-दहन की याद में ही यह अग्नि जलाई जाती है। एक मान्यता के अनुसार इस अवसर पर विवाहिता पुत्रियों को मां के घर से वस्त्र, मिठाई, रेवड़ी, फल आदि भेजा जाता है। यह रस्म यह याद दिलाता है कि घर की बेटियां उस परिवार के अभिन्न अंग है, उसे कभी भी विस्मृत नहीं किया जा सकता। यह रसम इस रिश्ते को और भी प्रगाढ़ बना जाता है। हमें यह कदापि नहीं भूलना चाहिए कि  यज्ञ के समय अपने जामाता शिव का भाग न निकालने का दक्ष प्रजापति का प्रायश्चित्त ही इसमें दिखाई पड़ता है। उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में खिचड़वार और दक्षिण भारत के पोंगल पर भी-जो लोहड़ी के समीप ही मनाए जाते हैं। इन पर्वों का अवसर पर भी बेटियों को भेंट जाती है।

एक माह पहले से शुरू हो जाती है तैयारियाँ

लोहड़ी पर्व से बीस पच्चीस दिन पहले ही बालक एवं बालिकाएं लोहड़ी के लोकगीत गाकर लकड़ी और उपले इकट्ठे करते हैं। संचित सामग्री से चौराहे या मुहल्ले के किसी खुले स्थान पर आग जलाई जाती है। मुहल्ले या गांव भर के लोग अग्नि के चारों ओर आसन जमा लेते हैं। घर और व्यवसाय के कामकाज से निपटकर प्रत्येक परिवार अग्नि की परिक्रमा करता है। रेवड़ी और कहीं – कहीं मक्की के भुने दाने अग्नि की भेंट किए जाते हैं । साथ ही प्रसाद स्वरूप में ये चीजें उपस्थित लोगों के बीच बाँटी जाती हैं। घर लौटते समय लोहड़ी में से दो चार दहकते कोयले, प्रसाद के रूप में, घर पर लाने की प्रथा भी है।

लोहड़ी से संबंधित कई कथाएँ प्रचलित है

इस पर्व से जुड़ी कई प्रचलित प्रथाएं भी शामिल हैं। जिन परिवारों में लड़के का विवाह होता है अथवा जिन्हें पुत्र प्राप्ति होती है, उनसे पैसे लेकर मुहल्ले या गांव भर में बच्चे ही बराबर बराबर रेवड़ी बांटते हैं। लोहड़ी के दिन अथवा उससे दो चार दिन पूर्व बालक बालिकाएं बाजारों में दुकानदारों तथा पथिकों से मोहमाया या महामाई के पैसे मांगते हैं, इनसे लकड़ी एवं रेवड़ी खरीदकर सामूहिक लोहड़ी में प्रयुक्त करते हैं। शहरों के कुछ शरारती लड़के दूसरे मुहल्लों में जाकर लोहड़ी से जलती हुई लकड़ी उठाकर अपने मुहल्ले की लोहड़ी में डाल देते हैं। यह लोहड़ी व्याहना कहलाता है। कई बार छीना झपटी में सिर फुटौवल भी हो जाती है। मंहगाई के कारण पर्याप्त लकड़ी और उपलों के अभाव में दुकानों के बाहर पड़ी लकड़ी की चीजें उठाकर जला देने की शरारतें भी चल पड़ी हैं। मेरी दृष्टि में यह कदापि उचित नहीं है। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि लोहड़ी पर लकड़ी नहीं जलनी चाहिए।‌ लकड़ी जलनी ही चाहिए। लेकिन हम सबों को उसी रफ्तार में जंगल लगाना भी चाहिए। तभी लोहड़ी पर लकड़ी जलाने का अधिकार है।

लोहड़ी पर्व समाज में मिलजुल कर रहने का संदेश देता है

लोहड़ी त्यौहार के उत्पत्ति के बारे में काफी मान्यताएं हैं। विशेष रूप से लोहड़ी पर्व पंजाब से जुड़ा हुआ माना जाता हैं। कई लोगो का मानना हैं कि यह त्यौहार जाड़े की ऋतू के आने का द्योतक के रूप में मनाया जाता हैं। आधुनिक युग में अब यह लोहड़ी का त्यौहार सिर्फ पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, जम्मू काश्मीर और हिमांचल में ही नहीं अपितु बंगाल तथा उड़िया लोगो द्वारा भी मनाया जा रहा हैं। लोहड़ी पर्व को दुल्ला भाटी की एक कहानी से भी जोड़ा जाता हैं। लोहड़ी की सभी गानों को दुल्ला भाटी से ही जुड़ा तथा यह भी कह सकते हैं कि लोहड़ी के गानों का केंद्र बिंदु दुल्ला भाटी को ही बनाया जाता हैं। दुल्ला भाटी मुगल शासक अकबर के समय में पंजाब में रहता था। उसे पंजाब के नायक की उपाधि से सम्मानित किया गया था। उस समय संदल बार के जगह पर लड़कियों को गुलामी के लिए बल पूर्वक अमीर लोगों को बेच जाता था जिसे दुल्ला भाटी ने एक योजना के तहत लड़कियों को न की मुक्त ही करवाया बल्कि उनकी शादी हिन्दू लडको से करवाई और उनकी शादी की सभी व्यवस्था भी करवाई। दुल्ला भाटी एक विद्रोही था । उसकी वंशावली भाटी थी। उसके पूर्वज भाटी शासक थे। जो संदल बार में था। अब संदल बार पाकिस्तान में स्थित है। वह सभी पंजाबियों का नायक था। इस तरह की कई बातें लोहड़ी पर्व से जुड़ी हुई हैं। इन बातों के पीछे सिर्फ एक ही उद्देश्य है कि मनुष्य समाज में मिलजुल कर रहें। सामाजिक और पारिवारिक दायित्व का निर्वहन पूरी निष्ठा और श्रद्धा के साथ करें। इसके साथ ईश्वर प्रदत्त जल, जंगल और भूमि को उसके नैसर्गिक रूप को किसी भी रूप में बिगड़ने न दें।

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