सरायकेला-खरसावां। दलमा वन्यजीव अभयारण्य की घटती वन भूमि, हाथियों के पलायन और इको सेंसिटिव जोन में हो रहे निर्माण कार्यों को लेकर सवाल उठने लगे हैं। चांडिल में झारखंड श्रमिक संघ के केंद्रीय महासचिव और जेएमएम नेता शैलेंद्र मेथी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर जल, जंगल, जमीन और दलमा के अस्तित्व को लेकर गंभीर चिंता जताई। उन्होंने आरोप लगाया कि पर्यटन को बढ़ावा देने के नाम पर दलमा के इको सेंसिटिव जोन को कमजोर करने की साजिश हो रही है। वहीं, कभी हाथियों के प्रजनन केंद्र के रूप में पहचान रखने वाले दलमा में अब हाथियों के झुंड नजर नहीं आते।
टाटा-रांची एनएच-33 स्थित सोहराई गार्डेन होटल परिसर में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में शैलेंद्र मेथी ने दावा किया कि दलमा वन्यजीव अभयारण्य का क्षेत्रफल 193.22 वर्ग किलोमीटर से घटकर 188.02 वर्ग किलोमीटर रह गया है। उन्होंने कहा कि पिछले 8 से 10 वर्षों में भोजन, पानी और उचित देखभाल की कमी के कारण हाथियों के झुंड ने दलमा से पलायन कर लिया है। वर्तमान में हाथियों के झुंड ईचागढ़ विधानसभा क्षेत्र में चांडिल डैम जलाशय के आसपास के जंगलों में डेरा जमाए हुए हैं।
ग्राम सभा और वन कानूनों के पालन पर उठाए सवाल
शैलेंद्र मेथी ने कहा कि जल, जंगल और जमीन की सुरक्षा के लिए ग्राम सभा की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है, लेकिन आज ग्राम सभा की व्यवस्था कमजोर होती जा रही है। उन्होंने कहा कि बिना ग्राम सभा की सहमति के आदिवासी जमीन से जुड़े फैसले नहीं लिए जा सकते। इसके बावजूद जमीन और जंगल से जुड़े मामलों में नियमों की अनदेखी की जा रही है। उन्होंने इको सेंसिटिव जोन के नियमों का हवाला देते हुए कहा कि पहले 10 किलोमीटर तक प्रतिबंधों की व्यवस्था थी, जिसे 2006 में संशोधन के बाद 3 किलोमीटर किया गया। उनका आरोप है कि अब निर्धारित दायरे में भी नियमों का सही तरीके से पालन नहीं हो रहा है।
हाथियों के लिए भोजन-पानी और कॉरिडोर की कमी
उन्होंने कहा कि दलमा में पर्यटक दूर-दराज के राज्यों से वन्यजीवों को देखने पहुंचते हैं, लेकिन जंगल भ्रमण के दौरान उन्हें हाथियों के झुंड देखने को नहीं मिलते। रास्तों में वन्यजीवों की तस्वीरों वाले बड़े-बड़े होर्डिंग जरूर दिखाई देते हैं, लेकिन वास्तविकता में बंदरों के अलावा दूसरे वन्यजीवों को देख पाना मुश्किल हो गया है। पर्यटक अंत में माकुलाकोचा चेकनाका स्थित हिरण पार्क और एलीफेंट एनक्लोजर में रखे हाथियों को देखकर लौट जाते हैं।
उन्होंने आरोप लगाया कि जंगलों की कटाई कर रिसॉर्ट और कॉटेज बनाए जा रहे हैं। हाथियों के पारंपरिक आवागमन मार्गों के आसपास पहाड़ों को काटकर पत्थरों का कारोबार किया जा रहा है। इससे वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास और उनके आवागमन पर असर पड़ रहा है।
प्रदूषित पानी और जंगलों की कटाई पर भी चिंता
शैलेंद्र मेथी ने क्षेत्र में नदी-नालों के प्रदूषण का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने आरोप लगाया कि गांवों में लोगों और मवेशियों को दूषित पानी का सामना करना पड़ रहा है, जिससे कई तरह की बीमारियों का खतरा बढ़ रहा है। उन्होंने सारंडा के जंगलों में पेड़ों की कटाई का मामला उठाते हुए कहा कि उन्होंने खुद किरिबुरु के जंगल में साल के करीब 100 कटे हुए पेड़ देखे हैं। उनका कहना है कि वन विभाग और संबंधित अधिकारियों को जंगल, वन्यजीव और प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा के लिए सख्त कदम उठाने चाहिए।
दलमा रेस्क्यू सेंटर में अब रजनी-बादल के साथ दिखेगा नन्हा शेखर
इधर, दलमा वन्यजीव अभयारण्य में पर्यटकों के लिए एक नया आकर्षण जुड़ गया है। अब यहां रजनी हथिनी और बादल हाथी के साथ सात महीने का नन्हा हाथी शेखर भी देखने को मिलेगा। सोमवार को शेखर को गुमला वन प्रमंडल से दलमा लाया गया। दलमा पहुंचने के बाद वह नए माहौल में काफी चंचल नजर आया। उसे संभालने में वनकर्मियों को काफी मशक्कत करनी पड़ी। बाद में उसके दोनों पैरों में रस्सी बांधकर नियंत्रित किया गया और रजनी हथिनी के महावत ने अपने हाथों से उसे भोजन कराया।
माकुलाकोचा स्थित चेकनाका हिरण पार्क और एलीफेंट एनक्लोजर में रजनी हथिनी को ईचागढ़ के पीलीद जंगल से, बादल हाथी को कोल्हान के पड़ाहाट जंगल से और नन्हे शेखर को गुमला के जंगल से लाया गया है। शेखर की देखभाल महावत रवि सिंह सरदार समेत तीन महावत कर रहे हैं।
दलमा की पहचान बचाने की चुनौती
एक ओर रेस्क्यू सेंटर में हाथियों की संख्या बढ़ाई जा रही है, वहीं दूसरी ओर दलमा के प्राकृतिक आवास और हाथियों के पलायन का मुद्दा गंभीर चिंता का विषय बना हुआ है। सवाल यह है कि क्या केवल रेस्क्यू किए गए हाथियों को रखकर दलमा की पुरानी पहचान वापस लाई जा सकती है? या फिर जंगल, पानी, भोजन और सुरक्षित कॉरिडोर उपलब्ध कराने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे? फिलहाल दलमा के संरक्षण और इको सेंसिटिव जोन के नियमों के पालन को लेकर वन विभाग की भूमिका पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
